शनिवार, 23 सितंबर 2017

अधिगम ( Learning ), शिक्षा मनोविज्ञान (ctet, tet , b.ed )


Learning, seekhna,adhigam





अधिगम ( Learning ) का अर्थ : अधिगम को शिक्षा मनोविज्ञान का दिल कहा गया है। अधिगम का शिक्षा के क्षेत्र में विशेष स्थान बताया गया है। क्योंकि शिक्षा का सर्व प्रथम उद्देश्य ही सीखना है। हम सभी जानते है मनुष्य का जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक सीखना ही है। घर, स्कूल एवं अपने आस – पास के वातावरण से मनुष्य कुछ ना कुछ सीखता ही रहता है और अपना सर्वपक्षीय विकास करता है।

सीखना या अधिगम (जर्मन: Lernen, अंग्रेज़ी: learning) एक व्यापक सतत् एवं जीवन पर्यन्त चलनेवाली प्रक्रिया है। मनुष्य जन्म के उपरांत ही सीखना प्रारंभ कर देता है और जीवन भर कुछ न कुछ सीखता रहता है। धीरे-धीरे वह अपने को वातावरण से समायोजित करने का प्रयत्न करता है। इस समायोजन के दौरान वह अपने अनुभवों से अधिक लाभ उठाने का प्रयास करता है। इस प्रक्रिया को मनोविज्ञान में सीखना कहते हैं। जिस व्यक्ति में सीखने की जितनी अधिक शक्ति होती है, उतना ही उसके जीवन का विकास होता है। सीखने की प्रक्रिया में व्यक्ति अनेक क्रियाऐं एवं उपक्रियाऐं करता है। अतः सीखना किसी स्थिति के प्रति सक्रिय प्रतिक्रिया है।


उदाहरणार्थ - छोटे बालक के सामने जलता दीपक ले जानेपर वह दीपक की लौ को पकड़ने का प्रयास करता है। इस प्रयास में उसका हाथ जलने लगता है। वह हाथ को पीछे खींच लेता है। पुनः जब कभी उसके सामने दीपक लाया जाता है तो वह अपने पूर्व अनुभव के आधार पर लौ पकड़ने के लिए, हाथ नहीं बढ़ाता है, वरन् उससे दूर हो जाता है। इसीविचार को स्थिति के प्रति प्रतिक्रिया करना कहते हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि अनुभव के आधार पर बालक के स्वाभाविक व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है


अधिगम की परिभाषायें

1. बुडवर्थ के अनुसार - ‘‘सीखना विकास की प्रक्रिया है।’’

2. स्किनर के अनुसार - ‘‘सीखना व्यवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है।’’

3. जे॰पी॰ गिलर्फड के अनुसार - ‘‘व्यवहार के कारण, व्यवहारमें परिवर्तन ही सीखना है।’’

4. कालविन के अनुसार - ‘‘पहले से निर्मित व्यवहार में अनुभवों द्वारा हुए परिवर्तन को अधिगम कहते हैं।’’

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि सीखने के कारण व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन आता है, व्यवहार में यह परिवर्तन बाह्य एवं आंतरिक दोनों ही प्रकार का हो सकता है। अतः सीखना एक प्रक्रिया है जिसमें अनुभव एवं प्रषिक्षण द्वारा व्यवहार में स्थायी या अस्थाई परिवर्तन दिखाई देता है।


आज हम देखते है सीखने की प्रक्रिया द्वारा दुनिया बहुत छोटी हो गई है। विभिन्न प्रकार के अनुभवों की वजह से मनुष्य के स्वाभाविक व्यवहार में जो परिवर्तन होता है उस प्रक्रिया अधिगम या सीखना कहते है।

अधिगम को अधिक विस्तार से समझने के लिए नीचे दिये परिभाषाएं को देखे –
  1. गेट्स व अन्य – ‘ अनुभव के द्वारा व्यवहार में होने वाले परिवर्तन को सीखना या अधिगम कहते है। “
  2. क्रो एण्ड क्रो के अनुसार – ” सीखने के अंतर्गत आदतें , ज्ञान तथा व्यवहार को ग्रहण करना शामिल है। “
  3. पाल के अनुसार – ” अधिगम, व्यक्ति में एक परिवर्तन है जो उसके वातावरण के परिवर्तनों के अनुसार होता है। “
उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि –
  1. अधिगम द्वारा मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन होता है।
  2. सीखना नए अनुभव ग्रहण करता है।
  3. यह जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है।
  4. यह एक सृजनात्मक पद्धति है।
  5. यह स्थानान्तरित होता है।
  6. सीखना सार्वभौमिक है।
  7. सीखना एक प्रक्रिया है न कि परिणाम ।
  8. यह एक मानासिक प्रक्रिया है।
  9. यह प्रगति और विकास है।

सीखने का स्वरूप अथवा प्रकृति

अधिगम के स्वरूप के बारे में द्वाष्टिकोण –
  1. व्यवहारवादी द्वाष्टिकोण – व्यवहारवादियों का विचार है कि अधिगम अनुभव के परिणाम के तौर पर व्यवहार में परिवर्तन का नाम है। मनुष्य तथा दूसरें प्राणी वातावरण में प्रतिक्रिया करते हैं। बच्चा जन्म से ही अपने वातावरण से कुछ सीखने का प्रयत्न करता है।
  2. गैस्टालट दृष्टिकोण – इस दृष्टिकोश के अनुसार अधिगम का आधार गिस्टालट ढ़ांचे पर निर्भर है। अधिगम सम्पूर्ण स्थिति की सम्पूर्ण प्रतिक्रिया है।
  3. होरमिक  दृष्टिकोण – यह दृष्टिकोण मैक्डूगल की देन है। यह अधिगम के लक्ष्य – केन्दित स्वरूप पर जोर देता है। अधिगम लक्ष्य को सामने रखकर किया जाता है।
  4. प्रयत्न तथा भूल दृष्टिकोण – यह दृष्टिकोण  थार्नडाइक की देन है। उसने बिल्लियों, कुत्तों तथा मछलियों पर बहुत से प्रयोग करके या निष्कर्ष निकाला कि वे प्रयत्न तथा भूल से बहुत कुध सीखते हैं।
  5. अधिगम का क्षेत्रीय द्वाष्टिकोण –  कर्ट लीविन ने इस द्वाष्टिकोण को प्रिपादित किया है। उसने लिखा है कि अधिगम परिस्थिति का प्रत्यक्ष ज्ञानात्मक संगठन है  और सीखने में प्रेरणा का महत्वपूर्ण हाथ है।
  अधिगम की विशेषताएं
  1. अधिगम लगातार चलने वाली प्रक्रिया है – मनुष्य जीवन भर अधिगम करता है जब तक उसकी मृत्यु नही हो जाती वह कुछ ना कुध सिखाता ही रहता है। यह प्रक्रिया  प्रत्यक्ष और अत्यक्ष रूप से जीवन भर चलता रहता है। इसमें व्यक्ति के ज्ञान, अनुभव, आदतें, रुचियां का विकास होता रहता है ।
  2. अधिगम अनुकूलन प्रक्रिया है – अधिगम का अनुकूलन में विशेष योगदान होता है। जन्म के बाद कुछ देर तक बच्चा दूसरों पर निर्भर रहता है बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार उसे ढलना पड़ता है। वह वातावरण के साथ अधिगम के आधार पर ही अनुकूलन करता है ।
  3. अधिगम सार्वभौमिक प्रक्रिया है – सीखना किसी एक मनुष्य या देश का अधिकार नही यह दुनिया के हर एक कोने में रहने वाले हर एक व्यक्ति के लिए है।
  4. अधिगम व्यवहार में परिवर्तन है – सीखना किसी भी तरह का हो उसके व्यवहार में आवश्यक ही परिवर्तन होगा। यह साकारात्मक या नाकारात्मक किसी भी रूप में हो सकता है।
  5. अधिगम उद्देश्यपूर्ण  एवं लक्ष्य केन्द्रित है – अगर हमारे पास कोई उद्देश्य नहीं है तो हमारे अधिगम का प्रभाव परिणाम के रूप में दिखाई नहीं देगा। जैसे जैसे विद्यार्थी सीखता है वैसे वैसे वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता जाता है।
  6. अधिगम पुराने और नए अनुभवों का योग – पुराने अनुभवों के आधार पर ही नए अनुभव ग्रहण होते है और एक नई व्यवस्था बनती है और यही सीखने का आधार है।
  7. अधिगम, शिक्षण अधिगम उद्देश्य को प्राप्त करने में सहायक – शिक्षण अधिगम उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अधिगम का सहरा लेना पड़ता है। इस साधन के द्वारा ही प्रभावशाली ज्ञान, सूझबूझ , रूचियां , द्वाष्टिकोण विकासित होता है।
  8. अधिगम का स्थानान्तरण – एक स्थिति में या किसी एक साधन द्वारा प्राप्त किया गया ज्ञान दूसरी अन्य परिस्थितियों में ज्ञान की प्राप्ति के लिए सहायक सिद्ध होता है, इसको अधिगम का स्थानान्तरण कहते हैं।
  9. अधिगम विवेकपूर्ण है – अधिगम कोई तकनीकी क्रिया नही है बाल्कि विवेकपूर्ण कार्य है जिसे बिना दिमाग के नहीं सीखा जा सकता । इस में बुद्धि का प्रयोग आति आवश्यक है।
10.अधिगम जीवन की मूलभूत प्रक्रिया –  अधिगम के बिना जीवन सफलतापूर्वक जीना और इसकी प्राति होना असम्भव है।
11.अधिगम व्यक्ति के सर्वागीण  विकास में सहायक – व्यक्ति का संतुलित और सर्वागीण विकास अधिगम के आधार पर हो सकता है।
12.अधिगम सक्रिय तथा सुजात्मक – अधिगम की प्रक्रिया में सीखने वाला सदा सक्रिय रहता है और सृजनात्मक कार्य करता है। इसी से उसे नए अनुभव होते हैं।
13.अधिगम चेतन और अचेतन अनुभव – अनुभव अधिगम सीखने वाले व्यक्ति के द्वारा जानबूझ कर अनजाने में अर्जित किया जा सकता है।
14.अधिगम विकास की प्रक्रिया – अधिगम किसी भी दिशा में हो सकता है लेकिन समाज में इच्छित दिशा में किया गया अधिगम ही स्वीकृत होता है और इसे ही हमेंशा विकास के द्वाष्टिकोण से देखा जाता है।
15.अधिगम द्वारा व्यवहार के सभी पक्ष प्रभावित – अधिगम द्वारा व्यक्ति के व्यवहारों के सभी पक्ष जैसे कौशल ज्ञान दृष्टिकोण, व्यक्तित्व शिष्टाचार, भय और रूचियां प्रभावित होती हैं।




सीखने के नियम



ई॰एल॰ थार्नडाइक अमेरिका का प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक हुआ है जिसने सीखने के कुछ नियमों की खोज की जिन्हें निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया गया है-


(क) मुख्य नियम (Primary Laws)


1. तत्परता का नियम
2. अभ्यास का नियम
उपयोग का नियम
अनुप्रयोग का नियम
3. प्रभाव का नियम

(ब) गौण नियम (Secondary Laws)

1. बहु-अनुक्रिया का नियम
2.मानसिक स्थिति का नियम
3. आंशिक क्रिया का नियम
4. समानता का नियम
5. साहचर्य-परिर्वतन का नियम

मुख्य नियम

सीखने के मुख्य नियम तीन है जो इस प्रकार हैं -


तत्परता का नियम - 

इस नियम के अनुसार जब व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए पहले से तैयार रहता है तो वह कार्य उसे आनन्द देता है एवं शीघ्र ही सीख लेता है। इसके विपरीत जब व्यक्ति कार्य को करने के लिए तैयार नहीं रहता या सीखने की इच्छा नहीं होती हैतो वह झुंझला जाता है या क्रोधित होता है व सीखने की गति धीमी होती है।
अभ्यास का नियम - इस नियम के अनुसार व्यक्ति जिस क्रिया को बार-बार करता है उस शीघ्र ही सीख जाता है तथा जिस क्रिया को छोड़ देता है या बहुत समय तक नहीं करता उसे वह भूलने लगताहै। जैसे‘- गणित के प्रष्न हल करना, टाइप करना, साइकिल चलाना आदि। इसे उपयोग तथा अनुपयोग ;नेम ंदक कपेनेमद्धका नियम भी कहते हैं।


प्रभाव का नियम - इस नियम के अनुसार जीवन में जिस कार्य को करने पर व्यक्ति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है या सुख का या संतोष मिलता है उन्हें वह सीखने का प्रयत्न करता है एवं जिन कार्यों को करने पर व्यक्ति पर बुरा प्रभाव पडता है उन्हें वह करना छोड़ देता है। इस नियमको सुख तथा दुःख ;च्समेंनतम ंदक च्पंदद्ध या पुरस्कार तथा दण्ड का नियम भी कहा जाता है।


गौण नियम

बहु अनुक्रिया नियम - इस नियम के अनुसार व्यक्ति के सामने किसी नई समस्या के आने पर उसे सुलझाने के लिए वह विभिन्न प्रतिक्रियाओं के हल ढूढने का प्रयत्न करता है। वह प्रतिक्रियायें तब तक करता रहता है जब तक समस्या का सही हल न खोज ले और उसकी समस्यासुलझ नहीं जाती। इससे उसे संतोष मिलता है थार्नडाइक का प्रयत्न एवं भूल द्वारा सीखने का सिद्धान्त इसी नियम पर आधारित है।


मानसिक स्थिति या मनोवृत्ति का नियम - इस नियम के अनुसार जब व्यक्ति सीखने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहता है तो वह शीघ्र ही सीख लेता है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति मानसिक रूप से किसी कार्य को सीखने के लिए तैयार नहीं रहता तो उस कार्य को वह सीख नहीं सकेगा।
आंशिक क्रिया का नियम - इस नियम के अनुसार व्यक्ति किसी समस्या को सुलझाने के लिए अनेक क्रियायें प्रयत्न एवं भूल के आधार पर करता है। वह अपनी अंर्तदृष्टि का उपयोग कर आंषिक क्रियाओं की सहायता से समस्या का हल ढूढ़ लेता है।


समानता का नियम - इस नियम के अनुसार किसी समस्या के प्रस्तुत होने पर व्यक्ति पूर्व अनुभव या परिस्थितियों में समानता पाये जाने पर उसके अनुभव स्वतः ही स्थानांतरित होकर सीखने में मद्द करते हैं।

साहचर्य परिवर्तन का नियम - इस नियम के अनुसार व्यक्ति प्राप्त ज्ञान का उपयोग अन्य परिस्थिति में या सहचारी उद्दीपक वस्तु के प्रति भी करने लगता है। जैसे-कुत्ते के मुह से भोजन सामग्री को देख कर लार टपकरने लगती है। परन्तु कुछ समय के बाद भोजन के बर्तनको ही देख कर लार टपकने लगती है।




निप्कर्ष :
अधिगम बच्चे के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। अधिगम के द्वारा हम अपने लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकते है। अधिगम को परिवर्तन , सुधार विकास, उन्नति तथा समायोजन के तुल्य जाना जाता हैं। यह केवल स्कूल की शिक्षा, साईकल चलाने, पढ़ने या टाईप करने तक सीमित नहीं बल्कि यह एक विशाल शब्द है जिसकी व्यक्ति पर गाहरी छाप या प्रभाव पड़ता है।

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