शनिवार, 28 जनवरी 2017

आईएएस रमेश घोलप - सफलता की कहानी |

 "संघर्ष करते हुए मत घबराना क्योंकि संघर्स के दौरान ही इंसान अकेला होता है, सफलता के बाद तो सारी दुनिया साथ होती है" । - आईएएस रमेश घोलप



Ramesh Gholap IAS story onGkinHindi

आईएएस रमेश घोलप  : गरीबी और पोलियो से लड़कर ये 'चूड़ीवाला' बना IAS, पढ़िए इनके संघर्ष की कहानी

आज हम जिनकी कहानी से आपको रूबरू करने जा रहे हैं उनका नाम रमेश घोलप है। महाराष्ट्र के सोलापुर का रहने वाला एक शख्स जो कभी मां के साथ चूड़ियां बेचकर अपना पेट पालता था आज वो एक आईएएस ऑफिसर है। गरीबी और अपंगता के दिन काटने वाले रमेश ने अपनी जिंदगी से कभी हार नहीं मानी और आज युवाओं के लिए वो मिसाल बन गए हैं।

रमेश के पिताजी अपनी पंक्चर की दुकान से 4 लोगों के परिवार का जैसे-तैसे गुजर-बसर करते थे। लेकिन ज्यादा शराब पीना उनके लिए घातक साबित हुआ और उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। परिवार का गुजर-बसर करने के लिए मां ने आसपास के गांवों में चूड़ियां बेचना शुरू किया। रमेश और उनके भाई इस काम में मां की मदद करते थे। लेकिन किस्मत को शायद उनकी और परीक्षा लेनी थी, इसी दौरान रमेश का बाएं पैर में पोलियो हो गया।

रमेश के गांव में पढ़ाई के लिए केवल एक ही प्राइमरी स्कूल था। रमेश को आगे की पढ़ाई करने के लिए उनके चाचा के पास बरसी भेज दिया गया। रमेश को पता था कि केवल पढ़ाई ही उनके परिवार की गरीबी को दूर कर सकती है। इसलिए वो जी-जान से पढ़ाई में जुट गए।

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वो पढ़ाई में काफी अच्छे थे और इसलिए अपने शिक्षकों के दिल में भी उन्होंने जगह बना ली। जब पिता की मौत हुई तब वो 12वीं की परीक्षा की तैयारी में जुटे हुए थे। गरीबी के ऐसे दिन थे कि उनके पास अपने पिता की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए 2 रुपए भी नहीं थे। किसी करह पड़ोसियों की मदद से वो पिता की अंतिम यात्रा में शामिल हो पाए।
उनपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था लेकिन फिर भी उन्होंने हार नही मानी और 88 प्रतिशत अंक के साथ 12वीं की परीक्षा पास की। 12वीं के बाद उन्होंने शिक्षा में डिप्लोमा किया और 2009 में शिक्षक बन गए। लेकिन रमेश यहीं रुकने वाले नहीं थे।

उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और आईएएस की परीक्षा में जी-जान से जुट गए। कड़ी मेहनत के बाद आखिरकार उन्होंने 2012 में सिविल सेवा परीक्षा में 287वीं रैंक हासिल की। इस सफलता के बाद जब वो पहली बार अपने गांव पहुंचे तो गांव वालों ने उन्हें पलकों पर बिठा लिया।

अगर आप अपनी विफलता का श्रेय विपरीत परिस्थितियों को देते हैं तो आपको रमेश से सीख लेने की जरुरत है। वो उन सभी लोगों के लिए मिसाल हैं जो आईएएस की परीक्षा पास करना चाहते हैं लेकिन किसी कारणवश वो कोचिंग करके तैयारी नहीं कर पाते।



आईएएस रमेश घोलप मूलतः महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में स्थित ‘महागांव’ के रहने वाले हैं।
फिलहाल वे झारखंड के खूंटी डिस्ट्रिक्ट में सब डिविजनल मजिस्ट्रेट(एसडीएम) हैं।
गरीबी से संघर्ष कर आईएएस बने रमेश घोलप ने पिछले साल बतौर एसडीओ बेरमो में प्रशिक्षण प्राप्त किया।
इन्होंने अभाव के बीच ना सिर्फ आईएएस बनने का सपना देखा, बल्कि इसे अपनी मेहनत से सच भी कर दिखाया।
काम किया, रुपए जुटाए और फिर पढ़ा। कलेक्टर बनने का सपना आंखों में संजोए रमेश पुणे पहुंचे।
पहले प्रयास में विफल रहे, पर वे डटे रहे। साल 2011 में पुन: यूपीएससी की परीक्षा दी।
इसमें रमेश 287वां स्थान प्राप्त कर आईएसएस बन चुके थे। पर खुशी तब दोगुनी हो गई, जब वे स्टेट सर्विस की परीक्षा में राज्य में फर्स्ट आए।



उनका सफर....
  • आईएएस रमेश घोलप मूलतः महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में स्थित ‘महागांव’ के रहने वाले हैं।
  • फिलहाल वे झारखंड के खूंटी डिस्ट्रिक्ट में सब डिविजनल मजिस्ट्रेट(एसडीएम) हैं।
  • गरीबी से संघर्ष कर आईएएस बने रमेश घोलप ने पिछले साल बतौर एसडीओ बेरमो में प्रशिक्षण प्राप्त किया।
  • इन्होंने अभाव के बीच ना सिर्फ आईएएस बनने का सपना देखा, बल्कि इसे अपनी मेहनत से सच भी कर दिखाया।
  • काम किया, रुपए जुटाए और फिर पढ़ा। कलेक्टर बनने का सपना आंखों में संजोए रमेश पुणे पहुंचे।
  • पहले प्रयास में विफल रहे, पर वे डटे रहे। साल 2011 में पुन: यूपीएससी की परीक्षा दी।
  • इसमें रमेश 287वां स्थान प्राप्त कर आईएसएस बन चुके थे। पर खुशी तब दोगुनी हो गई, जब वे स्टेट सर्विस की परीक्षा में राज्य में फर्स्ट आए।
  • बचपन में मां के साथ दिनभर चूड़ी बेचता था। इससे जो पैसे जमा होते थे, उसे पिताजी अपनी शराब पर खर्च कर देते थे। ना रहने के लिए घर था और ना पढ़ने के लिए पैसे।
  • मौसी के इंदिरा आवास में ही हम रहते थे। मैट्रिक परीक्षा से एक माह पूर्व ही पिता का निधन हो गया। इस सदमे ने मुझे झकझोरा। विपरीत हालात में मैट्रिक परीक्षा दी और 88.50% अंक हासिल किया।
  • मां को सामूहिक ऋण योजना के तहत गाय खरीदने के नाम पर 18 हजार ऋण मिले। इस राशि ने मुझे पढ़ाई जारी रखने में मदद की।
  • इसे लेकर मैं तहसीलदार की पढ़ाई करने निकला था। बाद में इसी रुपए से आईएएस की पढ़ाई की।
  • दीवारों पर नेताओं की घोषणाओं, दुकानों का प्रचार शादी की पेंटिंग करता था और पढ़ाई के लिए पैसे की व्यवस्था करता था।






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2 comments:

Lukesh Bande ने कहा…

Nice line ji ramesh ji dhanywad

Lukesh Bande ने कहा…

Good ramesh bhai ji

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