मंगलवार, 19 जनवरी 2016

महान वैज्ञानिक और उनकी उपलब्धियाँ ,भारत रत्‍न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम

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आप यहां इन विषयों से संबंधित जानकारी पाएंगे-

भारत रत् डॉ. .पी.जे. अब्दुल कलाम

जीवन परिचय

मिसाइलमैन .पी.जे. अब्दुल कलाम कलाम का जन्म:



भारत रत् डॉ. .पी.जे. अब्दुल कलाम

जीवन परिचय


चमत्कारिक प्रतिभा के धनी डॉ0 अवुल पकिर जैनुलआब्दीन अब्दुल कलाम भारत के ऐसे पहले वैज्ञानिक हैं, जो देश के राष्ट्रपति (11वें राष्ट्र पति के रूप में) के पद पर भी आसीन हुए।

 वे देश के ऐसे तीसरे राष्ट्र्पति (अन्य दो राष्ट्र पति हैं सर्वपल्लीन राधाकृष्णन और डॉ0 जा़किर हुसैन) भी हैं, जिन्हें राष्ट्रपति बनने से पूर्व देश के सर्वोच्चसम्मा्न ‘भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

 इसके साथ ही साथ वे देश के इकलौते राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने आजन्म अविवाहित रहकर देश सेवा का व्रत लिया है। 

 मिसाइलमैन .पी.जे. अब्दुल कलाम कलाम का जन्म:

अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तामिलनाडु के रामेश्वरम कस्बे के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। उनके पिता जैनुल आब्दीन नाविक थे। वे पाँच वख्त के नमाजी थे और दूसरों की मदद के लिए सदैव तत्पर रहते थे। कलाम की माता का नाम आशियम्मा था। वे एक धर्मपरायण और दयालु महिला थीं।

 सात भाई-बहनों वाले पविवार में कलाम सबसे छोटे थे, इसलिए उन्हें अपने माता-पिता का विशेष दुलार मिला।  पाँच वर्ष की अवस्था में रामेश्वमरम के प्राथमिक स्कूल में कलाम की शिक्षा का प्रारम्भ हुआ। उनकी प्रतिभा को देखकर उनके शिक्षक बहुत प्रभावित हुए और उन पर विशेष स्नेह रखने लगे। एक बार बुखार जाने के कारण कलाम स्कूल नहीं जा सके। यह देखकर उनके शिक्षक मुत्थुश जी काफी चिंतित हो गये और वे स्कूल समाप्त होने के बाद उनके घर जा पहुँचे। उन्होंने कलाम के स्कूल जाने का कारण पूछा और कहा कि यदि उन्हें किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता हो, तो वे नि:संकोच कह सकते हैं।

 कलाम के बचपन के दिन:   

कलाम का बचपन बड़ा संघर्ष पूर्ण रहा। वे प्रतिदिन सुबह चार बजे उठ कर गणित का ट्यूशन पढ़ने जाया करते थे। वहाँ से 5 बजे लौटने के बाद वे अपने पिता के साथ नमाज पढ़ते, फिर घर से तीन किलोमीटर दूर स्थित धनुषकोड़ी रेलवे स्टेशन से अखबार लाते और पैदल घूम-घूम कर बेचते। 8 बजे तक वे अखबार बेच कर घर लौट आते। उसके बाद तैयार होकर वे स्कूल चले जाते। स्कूल से लौटने के बाद शाम को वे अखबार के पैसों की वसूली के लिए निकल जाते।

 कलाम की लगन और मेहनत के कारण उनकी माँ खाने-पीने के मामले में उनका विशेष ध्यान रखती थीं। दक्षिण में चावल की पैदावार अधिक होने के कारण वहाँ रोटियाँ कम खाई जाती हैं। लेकिन इसके बावजूद कलाम को रोटियों से विशेष लगाव था। इसलिए उनकी माँ उन्हें प्रतिदिन खाने में दो रोटियाँ अवश्य दिया करती थीं। एक बार उनके घर में खाने में गिनी-चुनीं रोटियाँ ही थीं। यह देखकर माँ ने अपने हिस्से की रोटी कलाम को दे दी। उनके बड़े भाई ने कलाम को धीरे से यह बात बता दी। इससे कलाम अभिभूत हो उठे और दौड़ कर माँ से लिपट गये।

प्राइमरी स्कूल के बाद कलाम ने श्वार्ट्ज हाईस्कूल, रामनाथपुरम में प्रवेश लिया। वहाँ की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने 1950 में सेंट जोसेफ कॉलेज, त्रिची में प्रवेश लिया। वहाँ से उन्होंने भौतिकी और गणित विषयों के साथ बी.एस-सी. की डिग्री प्राप्त की।

अपने अध्यापकों की सलाह पर उन्होंने स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए मद्रास इंस्टीयट्यूट ऑफ टेक्ना्लॉजी (एम.आई.टी.), चेन्नई का रूख किया। वहाँ पर उन्होंने अपने सपनों को आकार देने के लिए एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग का चयन किया। 

कलाम का स्वर्णिम सफर
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कलाम की हार्दिक इच्छा थी कि वे वायु सेना में भर्ती हों तथा देश की सेवा करें। किन्तु इस इच्छा के पूरी हो पाने पर उन्होंने बे-मन से रक्षा मंत्रालय के तकनीकी विकास एवं उत्पाद DTD & P (Air) का चुनाव किया। वहाँ पर उन्होंने 1958 में तकनीकी केन्द्र (सिविल विमानन) में वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक का कार्यभार संभाला। उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर वहाँ पहले ही साल में एक पराध्वनिक लक्ष्यभेदी विमान की डिजाइन तैयार करके अपने स्वर्णिम सफर की शुरूआत की।


डॉ0 कलाम के जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब वे 1962 में 'भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन' (Indian Space Research Organisation-ISRO) से जुड़े। यहाँ पर उन्होंने विभिन्न पदों पर कार्य किया। उन्होंने अपने निर्देशन में उन्नत संयोजित पदार्थों का विकास आरम्भ किया।



भारत रत् डॉ. .पी.जे. अब्दुल कलाम और उनकी उपलब्धियां
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उन्होंने त्रिवेंद्रम में स्पेस साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी सेंटर (एस.एस.टी.सी.) मेंफाइबर रिइनफोर्स्ड प्लास्टिकडिवीजन (Fibre Reinforced Plastics -FRP) की स्थापना की। इसके साथ ही साथ उन्होंने यहाँ पर आम आदमी से लेकर सेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अनेक महत्वपूर्ण परियोजनाओं की शुरूआत की।

  उन्हीं दिनों इसरो में स्वदेशी क्षमता विकसित करने के उद्देश्यसेउपग्रह प्रक्षेपण यान कार्यक्रम’ (Satellite Launching Vehicle-3) की शुरूआत हुई।
कलाम की योग्यताओं को दृष्टिगत रखते हुए उन्हें इस योजना का प्रोजेक्ट डायरेक्टर नियुक्त किया गया।

 इस योजना का मुख्य उद्देश्य था उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थायपित करने के लिए एक भरोसेमंद प्रणाली का विकास एवं संचालन।

कलाम ने अपनी अद्भुत प्रतिभा के बल पर इस योजना को भलीभाँति अंजाम तक पहुँचाया तथा जुलाई 1980 मेंरोहिणीउपग्रह को पृथ्वी की कक्षा के निकट स्थापित करके भारत कोअंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष क्लबके सदस्य के रूप में स्थापित कर दिया।

डॉ0 कलाम ने भारत को रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश् से रक्षामंत्री के तत्कालीन वैज्ञानिक सलाहकार डॉ0 वी.एस. अरूणाचलम के मार्गदर्शन में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम’ (Integrated Guided Missile Development Programme -IGMDP) की शुरूआत की।

 इस योजना के अंतर्गत त्रिशूल (नीची उड़ान भरने वाले हेलाकॉप्ट रों, विमानों तथा विमानभेदी मिसाइलों को निशाना बनाने में सक्षम), पृथ्वी (जमीन से जमीन पर मार करने वाली, 150 किमी0 तक अचूक निशाना लगाने वाली हल्कीं मिसाइल), आकाश’ (15 सेकंड में 25 किमी तक जमीन से हवा में मार करने वाली यह सुपरसोनिक मिसाइल एक साथ चार लक्ष्यों पर वार करने में सक्षम),नाग (हवा से जमीन पर अचूक मार करने वाली टैंक भेदी मिसाइल), अग्नि(बेहद उच्च तापमान पर भीकूलरहने वाली 5000 किमी0 तक मार करने वाली मिसाइल) एवं ‘ब्रह्मोस’ (रूस से साथ संयुक्त् रूप से विकसित मिसाइल, ध्व़नि से भी तेज चलने तथा धरती, आसमान और समुद्र में मार करने में सक्षम) मिसाइलें विकसित हुईं। 

 इन मिसाइलों के सफल प्रेक्षण ने भारत को उन देशों की कतार में ला खड़ा किया, जो उन्नत प्रौद्योगिकी शस्त्र प्रणाली से सम्पन्न हैं।

रक्षा क्षेत्र में विकास की यह गति इसी प्रकार बनी रहे, इसके लिए डॉ0 कलाम ने डिपार्टमेन्ट ऑफ डिफेंस रिसर्च एण्डर डेवलपमेन्टं ऑर्गेनाइजेशन अर्थात डी.आर.डी.. (Defence Research and Development Organisation -DRDO) का विस्तार करते हुए आर.सी.आई. नामक एक उन्नत अनुसंधान केन्द्र की स्थापना भी की।

  डॉ0 कलाम ने जुलाई 1992 से दिसम्बर 1999 तक रक्षा मंत्री के विज्ञान सलाहकार तथा डी.आर.डी.. के सचिव के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान कीं।

उन्होंने भारत को सुपर पॉवरबनाने के लिए 11 मई और 13 मई 1998 को सफल परमाणु परीक्षण किया। इस प्रकार भारत ने परमाणु हथियार के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण सफलता अर्जित की।

  डॉ0 कलाम नवम्बर 1999 में भारत सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार रहे। इस दौरान उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्रदान किया गया। उन्होंने भारत के विकास स्तर को विज्ञान के क्षेत्र में अत्याधुनिक करने के लिए एक विशिष्ट सोच प्रदान की तथा अनेक वैज्ञानिक प्रणालियों तथा रणनीतियों को कुशलतापूर्वक सम्पन्न कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
 नवम्बर 2001 में प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार का पद छोड़ने के बाद उन्होंने अन्ना विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान कीं।

उन्होंने अपनी सोच को अमल में लाने के लिए इस देश के बच्चों और युवाओं को जागरूक करने का बीड़ा लिया। इस हेतु उन्होंने निश्चय किया कि वे एक लाख विद्यार्थियों से मिलेंगे और उन्हें देश सेवा के लिए प्रेरित करने का कार्य करेंगे।

 डॉ0 कलाम 25 जुलाई 2002 को भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित हुए। वे 25 जुलाई 2007 तक इस पद पर रहे।

 वह अपने देश भारत को एक विकसित एवं महाशक्तिशाली राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं। उनके पास देश को इस स्थान तक ले जाने के लिए एक स्पष्ट और प्रभावी कार्य योजना थीं

 उनकी पुस्तक 'इण्डिया 2020' में उनका देश के विकास का समग्र दृष्टिकोण देखा जा सकता है। वे अपनी इस संकल्पना को उद्घाटित करते हुए कहते हैं कि इसके लिए भारत को कृषि एवं खाद्य प्रसंस्ककरण, ऊर्जा, शिक्षा स्वास्थ्, सूचना प्रौद्योगिकी, परमाणु, अंतरिक्ष और रक्षा प्रौद्योगिकी के विकास पर ध्यान देना होगा। 





डॉ0 अब्दुल कलाम की पुस्तकें: 

डॉ0 अब्दुल कलाम भारतीय इतिहास के ऐसे पुरूष हैं, जिनसे लाखों लोग प्रेरणा ग्रहण करते हैं।

 अरूण तिवारी लिखित उनकी जीवनी 'विंग्स ऑफ़ फायर' (Wings of Fire) भारतीय युवाओं और बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय है।

उनकी लिखी पुस्तकों में 'गाइडिंग सोल्स: डायलॉग्स ऑन पर्पज ऑफ़ लाइफ' (Guiding Souls Dialogues on the Purpose of life) एक गम्भीर कृति है, जिसके सह लेखक अरूण के. तिवारी हैं। इसमें उन्होंने अपने आत्मिक विचारों को प्रकट किया है। 

इनके अतिरिक्त उनकी अन्य चर्चित पुस्तकें हैं-

1. ‘इग्नाइटेड माइंडस: अनलीशिंग दा पॉवर विदीन इंडिया’ (Ignited Minds:Unleashing The Power Within India),

2.‘एनविजनिंग अन एमपावर्ड नेशन: टेक्नोलॉजी फॉर सोसायटल ट्रांसफारमेशन’ (Envisioning an Empowered Nation: Technology for Societal Transformation), 

3.‘डेवलपमेंट्स इन फ्ल्यूड मैकेनिक्सि एण्ड स्पेस टेक्नालॉजी’ (Developments in Fluid Mechanics and Space Technology), सह लेखक- आर. नरसिम्हा‍,

4.‘2020: विज़न फॉर दा न्यू मिलेनियम’ (2020- A Vision for the New Millennium) सह लेखक- वाई.एस. राजन,

5.‘इनविज़निंग ऐन इम्पॉएवर्ड नेशन: टेक्नोमलॅजी फॉर सोसाइटल ट्राँसफॉरमेशन’ (Envisioning an Empowered Nation: Technology for Societal Transformation) सह लेखक- . सिवाथनु पिल्ललई।


  डॉ0 कलाम ने तमिल भाषा में कविताएँ भी लिखी हैं, जो अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। उनकी कविताओं का एक संग्रहदा लाइफ ट्री’ (The Life Tree) के नाम से अंग्रेजी में भी प्रकाशित हुआ है।


कलाम को मिलने वाले पुरस्कार/सम्मान: 

 डॉ0 कलाम की विद्वता एवं योग्य ता को दृष्टिगत रखते हुए सम्मान स्वरूप उन्हें अन्ना यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, कल्याणी विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, मैसूर विश्वविद्यालय, रूड़की विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, मद्रास विश्वविद्यालय, आंध्र विश्वविद्यालय, भारतीदासन छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय, तेजपुर विश्वविद्यालय, कामराज मदुरै विश्वविद्यालय, राजीव गाँधी प्रौद्यौगिकी विश्वविद्यालय, आई.आई.टी. दिल्ली, आई.आई.टी; मुम्बई, आई.आई.टी. कानपुर, बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी, इंडियन स्कूल ऑफ साइंस, सयाजीराव यूनिवर्सिटी औफ बड़ौदा, मनीपाल एकेडमी ऑफ हॉयर एजुकेशन, विश्वेश्वरैया टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी ने अलग-अलगडॉक्टर ऑफ साइंसकी मानद उपाधियाँ प्रदान की। 

 इसके अतिरिक्त् जवाहरलाल नेहरू टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने उन्हें पी-एच0डी0’ (डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी) तथा विश्वभारती शान्ति निकेतन और डॉ0 बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, औरंगाबाद ने उन्हेंडी0लिट0’ (डॉक्टर ऑफ लिटरेचर) की मानद उपाधियाँ प्रदान कीं। 

इनके साथ ही साथ वे इण्डियन नेशनल एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग, इण्डियन एकेडमी ऑफ साइंसेज, बंगलुरू, नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली के सम्मानित सदस्य, एरोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया, इंस्टीट्यूशन ऑफ इलेक्ट्रानिक्स एण्ड् टेलीकम्यूनिकेशन इंजीनियर्स के मानद सदस्य, इजीनियरिंग स्टॉफ कॉलेज ऑफ इण्डिया के प्रोफेसर तथा इसरो के विशेष प्रोफेसर हैं।

  डॉ0 कलाम की जीवन गाथा किसी रोचक उपन्यास के महानायक की तरह रही है। उनके द्वारा किये गये विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकास के कारण उन्हें विभिन्न संस्थाओं ने अनेकानेक पुरस्कारों/ सम्मानों से नवाजा है।

  डॉ0 कलाम को मिले पुरस्कार/ सम्मान

1. नेशनल डिजाइन एवार्ड-1980 (इंस्टीटयूशन ऑफ इंजीनियर्स, भारत),

2. डॉ0 बिरेन रॉय स्पे्स अवार्ड-1986 (एरोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इण्डिया), 

3. ओम प्रकाश भसीन पुरस्कायर

4. राष्ट्रीय नेहरू पुरस्कार-1990 (मध्यप्रदेश सरकार),

 5. आर्यभट्ट पुरस्कार-1994 (एस्ट्रोपनॉमिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया), 

 6. प्रो. वाई. नयूडम्मा (मेमोरियल गोल्ड मेडल-1996 (आंध्र प्रदेश एकेडमी ऑफ साइंसेज), 

7. जी.एम. मोदी पुरस्काफर-1996,   

8. एच.के. फिरोदिया पुरस्कार-1996,  
9. वीर सावरकर पुरस्कार-1998 आदि। 

उन्हें राष्ट्रीय एकता के लिए इन्दिरा गाँधी पुरस्कार (1997) भी प्रदान किया गया।

इसके अलावा भारत सरकार ने उन्हें क्रमशपद्म भूषण (1981), पद्म विभूषण (1990) एवं ‘भारत रत्न’ सम्मान (1997) से भी विभूषित किया गया।

सादा जीवन जीवन जीने वाले तथा उच् विचार धारण करने वाले डॉ कलाम ने 27  जूलाइ को  आख़िरी  सांस  ली।

वे अपनी उन्नत प्रतिभा के कारण सभी धर्म, जाति एवं सम्प्रदायों की नजर में महान आदर्श के रूप में स्वीकार्य रहे हैं। भारत की वर्तमान पीढ़ी ही नहीं अपितु आने वाली अनेक नस्लें उनके महान व्यक्तित् से प्रेरणा ग्रहण करती है।

अलबर्ट आइन्स्टीन-
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 अगर कोई इतिहास के सर्वाधिक जीनिअस व्यक्ति के बारे में प्रश्न करता है तो लगभग सभी के दिमाग में अलबर्ट आइन्स्टीन का नाम कौंध जाता है. उसके विश्वप्रसिद्ध सापेक्षकता के सिद्धांत (Theory of Relativity) और क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics) में उसकी खोजों ने लोगों के देखने का नजरिया ही बदल दिया. जी हाँ, भौतिक जगत के इस शहंशाह का जन्म आज ही के दिन यानि 14 मार्च 1879 को हुआ था.

परिचय
 
अल्बर्ट आइंस्टीन
सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी
जन्म: 14 मार्च 1879,जर्मनी
 
मृत्यु: 18 अप्रैल 1955, प्रिंसटन, न्यू जर्सी , अमेरिका
 
प्रभावित : आइजैक न्यूटन, महात्मा गांधी, से  
 
बच्चे: एडवर्ड आइंस्टीन , हंस अल्बर्ट आइंस्टीन, Lieserl आइंस्टीन


         आइन्स्टीन ने पहली बार प्रकाश विद्युत प्रभाव की व्याख्या प्लांक के क्वांटम परिकल्पना के आधार पर की, जिसके अनुसार प्रकाश ऊर्जा के छोटे छोटे बंडलों के रूप में चलता है. यह क्वांटम भौतिकी की शुरुआत थी. इस कार्य के लिए आइन्स्टीन को 1921 का भौतिकी का नोबेल पुरूस्कार दिया गया.

आइन्स्टीन ने पहली बार अपने विश्व प्रसिद्ध फार्मूले E=mc2 द्बारा बताया कि पदार्थ तथा ऊर्जा को परस्पर बदलना संभव है. सन 1905 आइन्स्टीन के लिए और भौतिक जगत के लिए भाग्यशाली सिद्ध हुआ.

 जब आइन्स्टीन के पांच रिसर्च पेपर जर्मनी के भौतिकी जर्नल में प्रकाशित हुए, इन रिसर्च पेपरों ने भौतिक जगत में तहलका मचा दिया.

पहला पत्र-

 पहला पत्र प्रकाश विद्युत प्रभाव की प्लांक सिद्धांत के आधार पर व्याख्या करता था. इससे पहले प्रकाश किरणों के बारे में माना जाता था की वह तरंगों के रूप में चलता है. लेकिन इस सिद्धांत के बाद प्रकाश की द्वैत प्रकृति सामने आई. पता चला की प्रकाश तरंग और कण दोनों की तरह व्यवहार करता है.

 1921 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार उसे इसी कार्य के लिए मिला.


 दूसरा पत्र-

दूसरा पत्र ब्राउनियन गति पर आधारित था. जिसमें अणुओं की मुक्त गति की व्याख्या की गई थी. इस व्याख्या से पदार्थ के आणविक परमाण्विक मॉडल को बल मिला. इस पत्र में आइन्स्टीन ने प्रोबेबिलिटी थ्योरी (Probability Theory) का समावेश किया, जिसने क्वांटम भौतिकी को दृढ गणितीय आधार दिया. आगे इस विषय को आइन्स्टीन ने भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्रनाथ बोस (Satyendra Nath Bose) के साथ डेवेलप किया और बोस आइन्स्टीन सांख्यकी (Bose Einstein Statistics) की स्थापना की.

 साथ ही अणुओं तथा मूल कणों के व्यवहार से संबधित दूसरी शाखाएं भी इससे डेवेलप हुईं जिनमें फर्मी डिराक सांख्यकी प्रमुख है.

 तीसरा पत्र- 

तीसरा पत्र पदार्थ ऊर्जा का मशहूर सम्बन्ध E=mc2 था. पहली बार यह रहस्योद्घाटन हुआ कि पदार्थ को ऊर्जा में बदला जा सकता है. यहीं से दुनिया परमाणु ऊर्जा से परिचित हुई.

 चौथा पत्र

चौथे पत्र में सापेक्षकता के विशेष सिद्धांत (Special Theory of Relativity) को ज़ाहिर किया गया था. यह एक कठिन थ्योरी है. आम भाषा में कहा जाए तो ब्रह्माण्ड के सारे घटक एक दूसरे के सापेक्ष गति में हैं. जब हम कोई पिंड, स्टार इत्यादि देखते हैं तो उसकी द्रष्टव्य स्थिति उसकी स्पीड, दूरी और समय (Space-Time) पर निर्भर करती है. मान लिया कोई तारा हमारी पृथ्वी से पांच सौ प्रकाश वर्ष दूर है. इसका मतलब हुआ की हम उसकी पांच सौ वर्ष पहले की स्थिति देख रहे हैं. वर्तमान में तो वह कहीं और होगा. और अगर उसकी स्पीड बहुत तेज़ है तो उसका आकार भी उसकी रुकी अवस्था के आकार से भिन्न दिखाई देगा. इस थ्योरी से कई चमत्कारी निष्कर्ष निकले. जैसे कि कोई पदार्थ प्रकाश के वेग से या उससे अधिक वेग से नहीं चल सकता. साथ ही अत्यधिक वेग से चलने पर वस्तुओं का द्रव्यमान बढ़ जाता है जबकि लम्बाई घट जाती है. इस थ्योरी ने निर्वात में युनिवर्सल माध्यम ईथर की परिकल्पना को निरस्त कर दिया.


इन पेपर्स के प्रकाशन के दस वर्ष बाद 1915 में आइन्स्टीन ने एक और आश्चर्यजनक थ्योरी दी जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी (General Theory of Relativity - सापेक्षकता का व्यापक सिद्धांत).

सापेक्षकता का व्यापक सिद्धांत-


इसमें उसने सापेक्षकता में गुरुत्वाकर्षण को भी शामिल किया, उसने बताया की प्रकाश के पथ पर गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव पड़ता है. नतीजे में जो सीधा आकाश हम देखते हैं असलिअत में वह वक्र (Curve) होता है. या यूं कहा जाए कि एक सीधा आकाश हम वक्र रूप में देखते हैं. और व्यापक बनाते हुए उसने कहा कि गुरुत्वाकर्षण (Gravitation) स्पेस-टाइम का घुमाव (Distortion) होता है, जो मैटर की वजह से पैदा होता है. और यह घुमाव (Distortion) दूसरे पदार्थों की गति पर प्रभाव डालता है.

कुछ सिद्धांतों पर आइन्स्टीन का समकालीन वैज्ञानिकों के साथ विवाद भी हुआ. जिनमें क्वांटम भौतिकी के क्षेत्र में नील्स बोर (Neals Bore) द्बारा प्रस्तुत सिद्धांत प्रमुख है.


नील्स बोर (Neals Bore) का सिद्धांत
इसमें बताया गया है कि एलेक्ट्रोन नाभिक के परितः किसी कक्षा में कुछ प्रोबबिलिटी (Probability) के साथ चक्कर लगाता है. इस पर आइन्स्टीन ने कहा कि ईश्वर पांसे नहीं फेंकता.

 आइन्स्टीन की धार्मिक आस्था विवादास्पद है. कुछ लोग उसे आस्तिक मानते हैं तो कुछ नास्तिक. लेकिन इतना तय है की वह किसी धर्म विशेष के अनुसार ईश्वर या गॉड को नहीं मानता था. उसके कथन के अनुसार दुनिया किसी ऐसी शक्ति ने बनाई है जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते.
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आइन्स्टीन ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष यूनिफाइड फील्ड थ्योरी (Unified Field Theory) पर कार्य करते हुए गुजारे, जो उसकी मृत्यु के बाद भी अधूरी रही. इस थ्योरी में प्रकृति के चार मूल बलों गुरुत्वाकर्षण, विद्युतचुम्बकीय, तीव्र तथा क्षीण नाभिकीय बलों का संयुक्तीकरण करना था. आज भी इस थ्योरी पर कार्य जारी है.



डॉ0 जेन गुडॉल 
(चिम्पैंजियों की दोस्)
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जीवन परिचय


मनुष् की भाषा अगर मनुष् समझ लेता है, तो इसमें आश्चर्यचकित करने वाली कोई बात नहीं, किन्तु कोई मनुष् जानवरों की भाषा, उनके हाव-भाव को, तरह-तरह की उनकी आवाजों को समझ ले, तो यह वाकई आश्चर्य की बात होगी।

 इसी आश्चर्य को अंजाम देने में आज डॉ0 जेन गुडॉल (Jane Goodall) का नाम विश् के सम्माननीय जंतु वैज्ञानिक (Zooliogist) के रूप में लिया जाता है। 

 पूर्वी फ्रीका के तंजानिया देश में सन 1960 से लेकर 1995 तक का एक लंबा समय डॉ0 गुडॉल ने घने जंगलों में रहकर चिंपाजियों के साथ व्यतीत किया और उन पर शोध कार्य किया।

 उन्होंने अपने शोध के द्वारा बताया कि हम मानवों की तरह चिंपैंजी भी साथ-साथ खेलना, काम करना, लड़ना आदि काम करते हैं। 

 लंदन में 3 अप्रैल 1934 को जन्मीं डॉ0 जेन गुडाल ने अफ्रीकी देश तंजानिया में स्थित गोम् स्ट्रीम नेशनल पार्क (Gombe Stream National Park) में अपना शोध कार्य किया।

आज गुडॉल विश् भर में गोम् जैसे कई स्थानों के जंगलों को नष् करने वाले लोगों से बचाने के लिए भरसक प्रयास कर रही हैं। उनके द्वारा स्थापित संस्था रूट्स एण् शूट्स’ (Roots & Shoots) 70 देशों के स्कूल एवं कॉलेजों को पर्यावरण पशु और जनजाति की रक्षा के लिए प्रेरित कर ही है। एक चिप रिसर्चर होने के नाते वे संयुक् राष्ट्र की शांति की संदेशवाहक (UN Messenger of Peace) भी हैं। 

 26 वर्ष की अवस्था में चिम्पैंजियों पर शोध कार्य प्रारम् करने वाली गुडॉल को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने पी-एच0डी0 की उपाधि प्रदान की है। वे आजकल कई फार्मास्यूटिकल कंपनियों में व्यस् हैं तथा उसके साथ ही साथ पर्यावरण संरक्षण के कार्य में भी लगी हुई हैं। गुडॉल ने अपने अध्ययनों का निचोड़ स्वयं द्वारा रचित दो किताबोंवाइल् चिम्पैंजीस’ (Wild Chimpanzees), ‘इन शैडो ऑफ मैन’ (In the shadow of man) में दिए हैं। इसके अतिरिक् उनके पुस्तकें 'अफ्रीका इन माई ब्लड' (Africa in my blood) एवं 'हार्वेस् फॉर होप: एक गाइड टू माइंडफुल ईटिंग' (Harvest for Hope : A Guide to Mindful Eating) भी काफी चर्चित हैं।
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आज उनके कार्यों को विश् भर में मान्यता मिल रही है तथा अफ्रीका के घने वर्षा वनों में चिंपैंजियों की अठखेरियां एक बार फिर जीवंत हो गई है



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TANUJA  SHARMA

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