शनिवार, 23 मई 2015

पिता मजदूर, मां नेत्रहीन, खुद 100% बहरेपन का शिकार फिर भी बने IAS मनीराम शर्मा |





पिता मजदूर, मां नेत्रहीन, खुद 100% बहरेपन का शिकार फिर भी बने IAS अलवर/जयपुर. सरकारी भाषा में नि:शक्तजनों को अब फिजीकली डिसएबल्ड नहीं डिफ्रेंटली एबल्ड (भिन्न रूप से सक्षम) कहा जाता है। सुनने में लगता है कि सिर्फ शब्द का ही तो अंतर है, मगर कोई फिजीकली डिसएबल्ड कैसे डिफ्रेंटली एबल्ड बन सकता है ये जानना हो तो मिलिए आईएएस अधिकारी मनीराम शर्मा से।
राजस्थान के अलवर जिले के रहने वाले शर्मा फिलहाल हरियाणा के मेवात जिले में एडीएम और जिला परिषद के सीईओ हैं। उनसे मिलकर आपको शायद महसूस न हो, मगर शर्मा कानों से सुन नहीं सकते। सौ फीसदी बहरेपन के बावजूद मजदूर पिता का ये बेटा पहले क्लर्क, क्लर्क से व्याख्याता, व्याख्याता से आरएएस अधिकारी और फिर आईएएस बना। अपनी विलक्षण प्रतिभा से ही उसने यूपीएससी के मेडिकल बोर्ड को मजबूर किया कि सौ फीसदी बहरेपन के बावजूद उसे आंशिक बहरेपन का प्रमाण-पत्र दे। इसी प्रमाण-पत्र और प्रधानमंत्री कार्यालय की पहल पर मनीराम शर्मा आईएएस बने।
पिता मजदूर, मां नेत्रहीन…, गांव में स्कूल भी नहीं था शर्मा का गांव बदनगढ़ी अलवर जिले का पिछड़ा गांव है, यहां आज भी पढ़ने के लिए सरकारी स्कूल नहीं है। पढ़ने के लिए तीन किलोमीटर दूर अखेगढ़ गांव जाना पड़ता है। इसी गांव में मनीराम शर्मा के पिता मजदूरी करते थे। मां अंधी थी, गुजर-बसर भी नहीं हो रही थी लिहाजा बहरेपन का इलाज कराना प्राथमिकताओं से कोसों दूर था। नौ साल की उम्र में शर्मा की सुनने की क्षमता बिल्कुल खत्म हो गई। हिम्मत नहीं हारी। पढ़ाई जारी रखी। बच्चों से टीचर तक सब मजाक उड़ाते, मगर छोटे मनीराम ने इस निगेटिव एनर्जी को अपने लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा बना लिया। लगातार मेरिट में, स्नातक में टॉप 1990 में दसवीं में प्रदेश मेरिट में 5वां स्थान आया। 12वीं में प्रदेश सूची में 7वे स्थान पर रहे। बीए आनर्स में राजस्थान विश्वविद्यालय टॉप किया। इसके बाद बहरोड़ के गंडाला राउमावि. में क्लर्क बन गए। पढ़ाई जारी रखी, एक साल बाद क्लर्क की नौकरी छोड़ दी। बतौर प्राइवेट स्टूडेंट राजनीति विज्ञान में एमए किया, बीएड भी। नेट, स्लेट, जेआरएफ करने के साथ पीएचडी भी पूरी कर ली। कुछ समय के लिए टोंक जिले के देवली राजकीय महाविद्यालय में बतौर राजनीति विज्ञान व्याख्याता भी रहे। 2001 में आरएएस एलाइड परीक्षा पास की। भरतपुर में देवस्थान विभाग में बतौर निरीक्षक करीब पांच वर्ष तक नौकरी की। दो बार आईएएस में रिजेक्ट, तीसरी बार मेडिकल बोर्ड ही चौंका शर्मा ने पढ़ाई जारी रखी और 2005 में आईएएस परीक्षा में सामान्य वर्ग में वे 27वीं रैंक पर रहे। सौ फीसदी बहरापन होने से रिजेक्ट हो गए। 2006 में फिर आईएएस परीक्षा में 378वीं रैंक पर आए, इस बार फिर अयोग्य करार दिए गए। हिम्मत टूट रही थी, मगर तीसरी बार फिर कोशिश की। 2009 में एक बार फिर आईएएस परीक्षा उत्तीर्ण की। शर्मा के मुताबिक उस समय तक आंशिक बहरेपन वाले अभ्यर्थियों के लिए आरक्षण लागू हो गया था, मगर वह सौ फीसदी बहरे थे। लोगों की मदद से ऑपरेशन करवाया जिसके बाद उन्हें आंशिक तौर पर सुनाई देने लगा। वे मेडिकल बोर्ड में गए, शर्मा की लिप रीडिंग में विलक्षण प्रतिभा थी। बोर्ड सदस्यों के सवालों के जवाब इस ढंग से दिए कि सब चकरा गए। मशीनें उनके सौ फीसदी बहरेपन की पुष्टि कर रही थी, मगर उनकी कार्यशैली बता रही थी कि बहरापन आंशिक है। काफी जद्दोजहद के बाद शर्मा को आंशिक बहरे का प्रमाण पत्र दिया गया। पीएमओ की पहल पर शर्मा को योग्य मानते हुए 2010 में मणिपुर कैडर दिया गया। दो साल पहले उन्होंने कैडर बदलने के लिए पीएमओ में प्रार्थना पत्र दिया। तीन महीने पहले ही 9 फरवरी 2015 को नूंह मेवात के एडीएम कम जिला परिषद सीईओ पद पर लगाया गया।पिता से कहा था…बड़ा पास हुआ हूं, बड़ा अफसर ही बनूंगा दसवीं क्लास में शर्मा प्रदेश मेरिट में पांचवे स्थान पर आया। कहते हैं- मुझे तो कुछ सुनता नहीं था, दोस्त खेड़ली जाकर रिजल्ट देखकर आए, मेरे घर की तरफ हाथ हिलाकर दौड़ते आए, पिता को लगा मैं फेल हो  वे किसी परिचित विकास अधिकारी के पास ले गए और बोले- बेटा दसवीं में बड़ा पास हुआ है, चपरासी लगा दो। बीडीओ ने कहा- ये तो सुन ही नहीं सकता, इसे न घंटी सुनाई देगी न ही किसी की आवाज। ये कैसे चपरासी बन सकता है। पिता की आंखों में आंसू छलक आए, शर्मा कहते हैं- खुद को घोर अपमानित महसूस किया, मेरिट में आने से हौसला बढ़ चुका था। लौटते समय रास्ते में पिता का हाथ पकड़कर रोका और बोले- मुझ पर भरोसा रखो, बड़ा पास हुआ हूं तो एक दिन बड़ा अफसर ही बनूंगा। गया, मुझे भी कुछ समझ में नहीं आया। काफी देर बाद पता चला मै तो मेरिट में आया हूं। पिता मेरिट के मायने समझते नहीं थे, केवल इतना समझे की मैं बड़ा वाला पास हो गया। पिता को लगा अब मैं कम से कम किसी सरकारी संस्थान में चपरासी तो बन ही जाऊंगा।

मनीराम शर्मा
आईएएस अधिकारी

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