गुरुवार, 4 सितंबर 2014

Relationship: an emotional bond रिश्ता : एक भावनात्मक जुड़ाव

रिश्ते कितने नाजुक होते हैं कदाचित इस

बात का पता हमें तब चलता है जब कोई

सम्बन्ध टूट जाता है या टूटने लगता है. वैसे

तो आमतौर पर लोगों को यह कहते

सुना जा सकता है कि " मेरा उसके साथ बहुत

गहरा सम्बन्ध है." पर वास्तव में उसके

सम्बन्धों की गहराई का पता तो तब

चलता है जब सम्बन्ध

मिट्टी की भीगी दीवार की भांति दरक

जाते हैं.ठीक उसी प्रकार जैसे

किसी की कमी का एहसास हमें तब होता है

जब वह हमसे बिछड़ जाता है.

यदि थोडा सा विचार किया जाये तो हम

पाएंगे कि सम्बन्ध पेड़ों से

लटकती या दीवार पर चढ़ती उन कोमल

लताओं के समान है जो दीवार से गिरकर

या पेड़ से लटककर पथिक के रास्ते में आकर

उसके पैरों से उलझ जाती है - वैसे यह

कहना गलत होगा कि लताएँ पथिक के पैरों में

उलझ जाती हैं, क्योंकि उलझता तो पथिक है

स्वयं लताओं तक जाकर - और एक जरा से झटके

से टूट जाती है.

सम्बन्धों को भी लताओं की भांति बचाकर

चलना पड़ता है तभी सम्बन्ध लम्बे समय तक

चल पाते हैं.सम्बन्धों को निबाहने के लिए

मनुष्य को बड़ा ही सहनशील होना चाहिए

क्योंकि सम्बन्ध बनने में तो समय लगता है

किन्तु टूटने में पल भर

भी काफी है.हमारी एक छोटी सी चूक

वर्षों के सम्बन्धों पर भारी पड़ जाती है और

व्यक्ति को यह कहते देर नहीं लगती कि "

मेरा अब तुमसे कोई रिश्ता नहीं, मुझसे मिलने

या बात करने की किसी भी तरह से कोई

भी कोशिस अब मत करना."

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