गुरुवार, 18 सितंबर 2014

नानी की शिक्षाप्रद कहानियाँ Nanny's instructive stories

एक महात्मा विचरण करते हुए एक गृहस्थ के

पास पहुंचे । गृहस्थ ने उनका पर्याप्त आदर-

सत्कार किया । बातों-बातों में उन्होंने

गृहस्थ को बताया कि वे पशु-

पक्षियों की बोली समझते हैं । उसके पास से

अपने आश्रम लौटते समय उन्होंने

व्यक्ति को आशीर्वचनों से उपकृत

करना चाहा ।

वे बोले, "कहो, क्या आशीर्वाद दूं मैं तुम्हें ?

तुम किस दिशा में आगे बढ़ना और सफल

होना चाहोगे ?"

महात्मा ने गृहस्थ को उसकी इच्छाओं के

अनुरूप आशीर्वाद दिया । उनके विदा होते

समय गृहस्थ ने एक और मांग उनके सामने रख

दी । उसने कहा, "महाराज, आपने कहा है

कि आप पशु- पक्षियों की बातें समझ सकते हैं ।

आप यदि मुझ

पर प्रसन्न हों तो कृपया वह विद्या मुझे

भी सिखाते जाइये ।"

महात्मा ने उसे समझाते हुए कहा,

"देखो भाई, यह विद्या तुम्हारे काम

की नहीं है । इसके प्रयोग से तुम्हें मानसिक

कष्ट ही भोगना पड़ सकता है । न जाने कब

कौन-सी बातें तुम्हारे कान में पड़ें और तुम

चिंताग्रस्त हो जाओ । इस

विद्या की इच्छा मत करो । अन्य

जीवों की बातें सुनने से क्या लाभ ?"

लेकिन महात्मा की बातें वह गृहस्थ

नहीं माना । अंत में उसने इच्छित

विद्या पा ही ली । आरंभ में उस

विद्या का कोई दुरुपयोग उसके

हाथों नहीं हुआ । परंतु बाद में एक मौके पर

उसने अपने पालतू कुत्ते तथा मुर्गे के बीच

की बातचीत सुन ली । मुर्गे ने कुत्ते से कहा,

"सुनो, अपने मालिक के घोड़े का पिछला एक

पांव आज कुछ कांप रहा था । तुम्हें मालूम है

कि इसका क्या मतलब है ?" कुत्ते ने उससे

कहा कि इस बारे में उसे कोई

जानकारी नहीं । तब मुर्गे ने उसे

समझाया कि घोड़ा कुछ ही दिनों में बीमार

पड़कर चल बसेगा ।

वह गृहस्थ संयोग से उन दोनों की बातें सुन

रहा था । उसने सोचा कि ऐसे घोड़े को अब

पालने से क्या लाभ, क्यों न उसे बेचकर

पैसा कमाया लिया जाये ।

और उसने घोड़े को बेच दियाख् जिसकी बाद में

मौत हो गयी । गृहस्थ को पशु-

पक्षियों की बोली जानने से क्या लाभ

हो सकता है यह बात समझ में आ गयी । अब

वह ऐसे हर वार्तालाप पर ध्यान देने लगा ।

कुछ समय के पश्चात् कुत्ते-मुर्गे

की इसी प्रकार की एक और बातचीत उसके

कान में पड़ी । मुर्गा बोला, "बेचारा गधे

की हालत ठीक नहीं है । आज

उसका पिछला पांव कांप रहा था । यह

निकट भविष्य में

उसकी सुनिश्चित मृत्यु का संकेत है ।"

इस बार भी वह अपने गधे को बाजार में बेच

आया । समय बीता और पशु-पक्षी संवाद समझ

पाने की अपनी सामर्थ्य का लाभ वह गृहस्थ

यदा-कदा उठाता रहा । परंतु एक दिन उस

विद्या के लाभ की उसकी खुशी जाती रही ।

उसने फिर कुत्ते-मुर्गे की परस्पर बातें

सुनीं और उसके होस उड़ गये । मुर्गा कुत्ते से

कह रहा था, "बहुत बड़ी चिंता की बात है,

भाई । क्या बताऊं तुम्हें ! अपने मालिक

की अगले वर्ष इसी माह मुत्यु का योग है ।

अगर मालिक ने अपने बीमार घोड़े-गधे

दयाभाव से अपने ही पास रखे

होते और उनकी यथासंभव

तीमारदारी की होती तो उन्हें पुण्यलाभ

मिला होता और उन्हें दीर्घायुष्य

मिला होता । लेकिन अब कुछ

नहीं हो सकता ।"

उनकी बातों से वह गृहस्थ घबड़ा गया । वह

खोजते हुए महात्मा के आश्रम पर पहुंचा और

वहां उसने अपनी व्यथा सुना डाली ।

महात्मा बोले, "अब देर हो चुकी है ।

यदि तुमने मेरी बात मान ली होती और उस

विद्या में रुचि न ली होती तो तुम

सुखी रहते । मुझे मालूम था कि तुम लोभ-

लालच से नहीं बच पाओगे और उस

विद्या का दुरुपयोग करोगे । बिरले

ही होते

हैं जो लोभ से अपने को बचा पाते हैं । अब

जाओ और जीवन का शेष समय शुभकर्मों में

लगाकर परलोक सुधारो ।"

गृहस्थ को निराश हो लौटना पड़ा ।

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