गुरुवार, 28 अगस्त 2014

Veer durgadash

जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु के

बाद बादशाह औरंगजेब जोधपुर

को हड़पना चाहता था लेकिन जसवंत सिंह के

मंत्री दुर्गादास राठौर ने औरंगजेब की कोई

भी चाल कामयाब नहीं होने दी। जसवंत सिंह के

पुत्र राजकुमार अजीत सिंह को जोधपुर

की गद्दी पर बिठाने के लिए दुर्गादास ने मुगल

सेना से डटकर युद्ध किया। दुर्गादास ने

भी कभी हार नहीं मानी।

युद्ध के दौरान वे घोड़े की पीठ पर बैठकर

ही खाना खा लेते, उसकी पीठ पर बैठकर सो लेते

और लगातार युद्ध करते रहते।

अपनी सभी इच्छाएं और सुख उन्होंने जोधपुर

की रक्षा की खातिर बलिदान कर दिए थे। उनके

लिए देश और मानव धर्म ही सर्वोपरि था। एक

बार युद्ध में औरंगजेब के पोता-पोती दुर्गादास

के हाथ लग गए, लेकिन दुर्गादास ने उन्हें बड़े

सम्मान के साथ अपने यहां रखा। कुछ समय बाद

औरंगजेब ने संदेश भेजकर दोनों को वापस

मांगा तो दुर्गादास ने शर्त रखी कि बादशाह

जोधपुर के सिंहासन पर अजीत सिंह का अधिकार

स्वीकार कर लें। बादशाह ने शर्त मान ली।

जब औरंगजेब के पोता-पोती दिल्ली लौटे

तो उसने उनसे कहा- "तुम लोग विधर्मी के घर

रहकर आए हो, अत: कुरान का पाठ किया करो।"

पोती बोली- "हम लोग तो वहां भी रोज कुरान

पढ़ते थे। दुर्गादास ने हमारे लिए एक मुस्लिम

महिला रखी थी, जो हमें कुरान का पाठ

कराती थी।"

औरंगजेब दुर्गादास के प्रति श्रद्धावनत होकर

बोला- "सुभान अल्लाह! दुश्मन

भी हो तो अच्छा इंसान हो।"

सार यह है कि शत्रुता को निजता के सम्मान में

बाधक नहीं बनने दें और एक व्यापक दृष्टिकोण

रखते हुए अच्छाइयों की शक्ति को एकत्रित करें।

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

प्रेरक आलेख

आशीष भाई ने कहा…

बढ़िया सुंदर , धन्यवाद !
Information and solutions in Hindi ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )
आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 29 . 8 . 2014 दिन शुक्रवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

Lekhika 'Pari M Shlok' ने कहा…

sunder rochak aalekh

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