शनिवार, 9 अगस्त 2014

Inspirational stories

किसी गांव में एक ब्राह्मण रहा करता था| वह

बड़ा भला आदमी था, लेकिन साथ ही काम

को टाला करता था| वह यह मानकर

चलता था कि जो कुछ होता है, भाग्य से

होता है, वह अपने हाथ-पैर नहीं हिलाता था|

वह बहुत आलसी था| एक दिन एक साधु उसके घर

आये| ब्राह्मण और उसकी घरवाली ने उसका खूब

आदर-सत्कार किया|

साधु ने खुश होकर चलते समय ब्राह्मण से कहा -

"तुम बहुत गरीब हो! लो मैं तुम्हें पारस पत्थर

देता हूं| सात दिन के बाद मैं आऊंगा और इसे ले

जाऊंगा| इस बीच तुम

जितना सोना बनाना चाहो, बना लेना|"

ब्राह्मण ने पत्थर ले लिया| साधु चले गये| उनके

जाने के बाद ब्राह्मण ने घर में लोहा खोजा, उसे

बहुत थोड़ा लोहा मिला| वह

उसी को सोना बनाकर बेच आया और कुछ सामान

खरीद लाया|

अगले दिन स्त्री के बहुत जोर देने पर वह

लोहा खरीदने बाजार में गया तो लोहा कुछ

महंगा था| वह घर लौट आया| दो-तीन दिन

बाद फिर वह बाजार

गया तो पता चला कि लोहा तो अब पहले से

भी महंगा हो गया है|

'कोई बात नहीं|' उसने सोचा - 'एकाध दिन में

भाव जरूर नीचे आ जाएगा, तभी खरीदेंगे|'

किंतु लोहा सस्ता नहीं हुआ और दिन निकलते गए|

आठवें दिन साधु आये और उन्होंने अपना पत्थर

मांगा तो ब्राह्मण ने कहा - "महाराज,

मेरा तो सारा समय यों ही निकल गया|

अभी तो मैं कुछ भी सोना नहीं बना पाया| आप

कृपा करके इस पत्थर को कुछ दिन मेरे पास और

छोड़ दीजिए|"

लेकिन साधु राजी नहीं हुवे| उन्होंने कहा - "तुझ

जैसा आदमी जीवन में कुछ नहीं कर सकता|

तेरी जगह और कोई होता तो कुछ-का-कुछ कर

डालता| जो आदमी समय का उपयोग

करना नहीं जानता वह कभी सफल नहीं होता|"

ब्राह्मण पछताने लगा, पर अब

क्या हो सकता था| साधु पत्थर लेकर जा चुके थे|

उसे अपने आलस और भाग्य पर जरूरत से

ज्यादा यकीन की कीमत चुकानी पड़ी।

आलस आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन होता| ईश्वर

प्रदत्त अनेक अवसर प्रायः इस टालमटोल और

आलस के रवय्ये के भेंट चढ जाते हैं। इसीलिये कहते

हैं-----

"काल करे सो आज कर आज करे सो अब्।

पल में परलै होयगी बहुरि करेगा कब्॥"

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