शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

Emergency in india

25 जून 1975 की आधी रात को आपातकाल

की घोषणा कर दी गई थी, जो 21 मार्च

1977

तक लगी रही। तत्कालीन

राष्ट्रपति फखरुद्दीन

अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के

अनुरोध पर धारा 352 के तहत आपातकाल

की घोषणा की थी। इसे आजाद भारत का सबसे

विवादास्पद दौर भी माना जाता है।

लोकनायक

जयप्रकाश नारायण ने तो इसे भारतीय इतिहास

की सबसे ''काली अवधि'' की संज्ञा दी थी।

हाइकोर्ट का फैसला बना आपातकाल की वजह-

कहा जाता है कि आपातकाल की नींव 12 जून

1975 को ही रख दी गई थी। गुजरात में

कांग्रेस को करारी हार

का सामना करना पड़ा था।

इसके अगले ही दिन यानी 12 जून 1975

को ही इलाहबाद हाईकोर्ट ने

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली के

चुनाव

अभियान में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने

का दोषी पाया था और उनके चुनाव को खारिज

कर दिया था। इतना ही नहीं, इंदिरा पर छह

साल

तक चुनाव लड़ने पर और किसी भी तरह के पद

संभालने पर रोक भी लगा दी गई थी। इंदिरा ने

हाईकोर्ट का आदेश मानने से इनकार दिया और

सुप्रीम कोर्ट में अपील की। इसके बाद

ही आपातकाल की स्थितियां बनने लगीं।

विरोध बढ़ा, तो आपातकाल लगा-

1971 के चुनावों में विपक्षी दल कांग्रेस पर

धांधली के आरोप लगा थे। इंदिरा और कांग्रेस

सरकार के विरोध का नेतृत्व उस वक्त

जयप्रकाश नारायण कर रहे थे। उनका छात्र,

किसान, मजदूर संघ और आम भारतीय

भी समर्थन कर रहे थे। देश भर में हड़तालें चल

रही थीं। जय प्रकाश नारायण,

मोरारजी देसाई

सहित कुछ नेताओं के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन

दिल्ली तक आ पहुंचा। इंदिरा सरकार ने जेपी के

आंदोलन को सुरक्षा, पाकिस्तान के साथ युद्ध,

सूखा, 1973 के तेल संकट का हवाला देते हुए

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया।

इंदिरा ने

दावा किया कि हड़तालों और विरोध

प्रदर्शनों के

कारण देश की गति रुक रही है।

सिद्धार्थ शंकर रे ने दी सलाह-

इस समय इंदिरा लगातार परिस्थितियों पर

काबू

पाने की कोशिश कर रही थीं। इस बीच पश्चिम

बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर

रे ने इंदिरा गांधी को देश में आपातकाल लगाने

की सलाह दी। शंकर रे की सलाह पर

इंदिरा गांधी के ऑफिस से राष्ट्रपति के लिए

पत्र का मसौदा तैयार किया गया जिसमें

लिखा गया कि आंतरिक अस्थिरता के कारण देश

की सुरक्षा को खतरा है, इसलिए आपातकाल

की घोषणा की जाए। कहा जाता है

कि राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद खुद

आपातकाल लगाए जाने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन

इंदिरा और सरकार के दबाव में उन्हें आदेश पर

हस्ताक्षर करने पड़े।

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