रविवार, 31 अगस्त 2014

Anger control क्रोध पर नियंत्रण

भूदान- यज्ञ के दिनों की बात है|

विनोबाजी की पद-यात्रा उत्तर प्रदेश में चल

रही थी| उनके साथ बहुत थोड़े लोग थे|

मीराबहन के आश्रम 'पशुलोक' से हम हरिद्वार आ

रहे थे| विनोबाजी की कमर और पैर में चोट

लगी थी, उन्हें कुर्सी पर ले जाया जाता था, पर

बीच-बीच में वे कुर्सी से उतरकर पैदल चलने लगते

थे|

एक दिन जब वे पैदल चल रहे थे तो एक भाई उनके

पास आकर बोले - "बाबा मुझे गुस्सा बहुत

आता है| कैसे दूर करूं?"

विनोबाजी ने कहा - "बचपन में मुझे भी बहुत

गुस्सा आता था| मैं अपने पास

मिश्री रखता था जैसे

ही गुस्सा आया कि मिश्री का एक टुकड़ा मुंह में

डाल लिया| गुस्सा काबू में आ जाता था|"

"लेकिन कभी-

कभी ऐसा भी होता था कि गुस्सा आ

जाता था और मिश्री पास में नहीं होती थी|"

"तब आप क्या करते थे?" उन भाई ने उत्सुकता से

पूछा|

विनोबाजी ने कहा - "तब मैंने सोचा कि ऐसे

समय क्या किया जाए| सोचते-सोचते एक बात

ध्यान में आई| जब हमारे मन के प्रतिकूल कोई

चीज आती है तो हम एकदम उत्तेजित होते हैं|

यदि पहले क्षण को हम टाल जाएं तो गुस्से

को सहज ही जीत सकते हैं| हर्ष और विषाद से

हम तभी अभिभूत होते हैं

जबकि उनका पहला क्षण हम पर

हावी हो जाता है| उस क्षण को टालना शुरू में

थोड़ा कठिन होता है, लेकिन अभ्यास से वह बहुत

आसान हो जाता है|"

आगे विनोबाजी ने बताया कि इसका उन्होंने खूब

अभ्यास कर लिया| बापू को गोली लगी,

जमनालालजी का देहांत हुआ, किसी ने आकर खबर

दी, लेकिन उनके मन पर इसका कोई असर

नहीं हुआ| वे जो काम कर रहे थे, करते रहे, लेकिन

विनोबाजी ने कहा - "आगे जाकर लगा कि बापू

और जमनालालजी के जाने से

कितनी बड़ी क्षति हुई, किंतु पहले क्षण

तो ऐसा रहा, जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

1 comments:

आशीष भाई ने कहा…

वाह बहुत ही सुंदर , धन्यवाद !
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