सोमवार, 28 जुलाई 2014

***अपना-अपना महत्व***

एक योद्धा सैनिक था, जिसे उसके

शौर्य ,निष्ठा और साहस के लिए

जाना जाता था, कुछ समय से वह स्वयं को कुछ

निराश सा अनुभव करने लगा था। एक दिन वह

एक सन्यासी के पास अपनी निराशा पर सलाह

लेने पहुँचा। उसने देखा सन्यासी ध्यान में है वह

वहीं बैठ कर प्रतीक्षा करने लगा।

जब सन्यासी ने ध्यान पूर्ण कर लिया तब सैनिक

ने उससे पूछा - " मैं इतना हीन क्यों महसूस

करता हूँ ? मैंने कितनी ही लड़ाइयाँ जीती हैं ,

कितने ही असहाय लोगों की मदद की है। पर जब

मैं और लोगों को देखता हूँ तो लगता है कि मैं उनके

सामने कुछ नहीं हूँ , मेरे जीवन का कोई महत्त्व

ही नहीं है।"

सन्यासी ने कहा- "रुको; जब मैं पहले से एकत्रित

हुए लोगों के प्रश्नों का उत्तर दे लूँगा तब तुमसे

बात करूँगा।"

समुराई इंतज़ार करता रहा , शाम ढलने लगी और

धीरे -धीरे सभी लोग वापस चले गए। समुराई ने

सन्यासी से पूछा- " क्या अब आपके पास मेरे लिए

समय है ?"

सन्यासी ने इशारे से उसे अपने पीछे आने को कहा,

चाँद की रौशनी में सबकुछ बड़ा शांत और सौम्य

था, सारा वातावरण बड़ा ही मोहक प्रतीत

हो रहा था।

सन्यासी बोले- " तुम चाँद को देख रहे हो,

वो कितना खूबसूरत है ! वो सारी रात

इसी तरह चमकता रहेगा, हमें

शीतलता पहुंचाएगा, लेकिन कल सुबह फिर सूरज

निकल जायेगा, और सूरज

की रौशनी तो कहीं अधिक तेज होती है,

उसी की वजह से हम दिन में खूबसूरत पेड़ों ,

पहाड़ों और पूरी प्रकृति को साफ़ –साफ़ देख

पाते हैं, मैं तो कहूँगा कि चाँद की कोई ज़रुरत

ही नहीं है….उसका अस्तित्व ही बेकार है !!"

समुराई बोला- "अरे ! ये आप क्या कह रहे हैं,

ऐसा बिलकुल नहीं है ", " चाँद और सूरज बिलकुल

अलग -अलग हैं, दोनों की अपनी-

अपनी उपयोगिता है, आप इस तरह

दोनों की तुलना नहीं कर सकते। "

सन्यासी ने फिर कहा- "तो इसका मतलब तुम्हे

अपनी समस्या का हल पता है. हर इंसान दूसरे से

अलग होता है, हर किसी की अपनी -

अपनी खूबियाँ होती हैं, और वो अपने -अपने

तरीके से इस दुनिया को लाभ पहुंचाता है; बस

यही प्रमुख है बाकि सब गौण है।" ये कह कर

सन्यासी ने अपनी बात पूरी की।

प्रायः हम अपने गुणों को कम और दूसरों के

गुणों को अधिक आंकते हैं। परंतु यदि औरों में

भी विशेष गुणवत्ता है तो हमारे अन्दर भी कई

गुण मौजूद हैं। यह बात हमें भूलनी नहीं चा

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